प्रीत देह से नहीं दिल से होती है। चोखेर बाली ऐसा ही उपन्यास है, जो सामाजिक समस्या, वासना और पवित्र प्रेम की चाह के इर्द—गिर्द घूमता है। जब आशा और महेंद्र का निश्छल प्रेम परवान चढ़ रहा होता है तो संयोगवश विनोदनी का प्रवेश होता है, और महेन्द्र कामवासना के पाश में बंध जाता है। देह की प्यास उसे पतिव्रता आशा के प्रेम से दूर और विधवा विनोदनी के पास ले जाती है। विनोदनी का आकर्षण महेन्द्र नहीं, बल्कि उसके मित्र बिहारी के प्रति है।
महेंद्र और बिहारी की बेजोड़ मित्रता केवल विनोदनी की चाह के चलते टूट जाती है। थोड़े दिल, लेकिन अधिक दिमाग से काम लेने वाला बिहारी, महेन्द्र के खिलाफ कोई अनुचित कदम नहीं उठाता है।
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